Tuesday December 11, 2018
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उत्तरकाशी

उत्तरकाशी उत्तराखण्ड के उत्तर-पश्चिम में स्थित सीमान्त जनपदों में से एक है । ७९५१ वर्ग किमी० के क्षेत्रफल में फैले इस जनपद की सीमायें पूर्व में चमोली, दक्षिण में रुद्रप्रयाग एवं टिहरी गढ़वाल, पश्चिम में देहरादून से लगी होने के साथ-साथ उत्तर में पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश व पूर्वोत्तर में पड़ोसी देश चीन से लगी हुई हैं। जनपद का जनसंख्या घनत्व ४१ व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर, साक्षरता दर ७५.९८% (पुरूष: ८९.२६%, स्त्री: ६२.२३%) तथा लिंगानुपात १०००:९५९ है। यह एक पर्वतीय जनपद है । उत्तराखण्ड के चारधामों में से दो धाम गंगोत्री त्तथा यमुनोत्री इसी जनपद में स्थित है। गंगोत्री से कुछ दूरी पर स्थित है गंगा का वास्तविक उद्‌गम "गौमुख" । जनपद की मुख्य नदियों में भागीरथी (गंगा) तथा यमुना हैं। जनपद में और भी कई छोटी बड़ी सहायक नदियां है जिनमें से टौंस, असीगंगा व जड़गंगा प्रमुख हैं। भागीरथी नगर के तट पर बसा उत्तरकाशी नगर इस जनपद का मुख्यालय है जिसका धार्मिक दृष्टि से अपना एक अलग ही महत्व है। इसकी भौगोलिक स्थिति अक्षाशं ३०.७३ डिग्री उत्तर तथा देशान्तर ७८.४५ डिग्री पूर्व पर समुद्रतल से ११६५ मीटर (४४३६ फीट) है।

उत्तरकाशी जनपद की स्थापना २४ फरवरी १९६० को उत्तरकाशी तथा रवांई तहसील को तत्कालीन टिहरी जनपद से अलग गठित करके की गई थी । प्रशासनिक दृष्टि से यह जनपद छह तहसीलों (भटवाड़ी, चिन्यालीसौड़, डुन्डा, पुरोला, राजगढ़ी तथा मोरी) तथा छह सामुदायिक विकासखण्डों में (भटवाड़ी, चिन्यालीसौड़, डुन्डा, नौगाँव, पुरोला तथा मोरी) विभक्त है। उत्तरकाशी शब्द का अर्थ है "उत्तर में स्थित काशी", नाम से प्रतीत होता है कि उत्तरकाशी एक प्राचीन तथा धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासतों से समृद्ध स्थान है। इसकी तुलना वास्तविक काशी (वाराणसी) से की जाती है। पवित्र स्थान उत्तरकाशी दो नदियों स्यालमगाड व कालीगाड के बीच में स्थित है, जिन्हें क्रमश: वरूणा एवं असी के नाम से भी जाना जाता है। ठीक इसी तरह वास्तविक काशी (वाराणसी) भी दो नदियों वरूणा व असी के मध्य स्थित है। दोनों ही स्थानों में सबसे पवित्र घाट मणिकर्णिकाघाट स्थित है तथा दोनों ही स्थान विश्वनाथ मदिंर को समर्पित हैं। पौराणिक संदर्भ में उत्तरकाशी का अलग ही महत्व रहा है, प्राचीन काल में इसे बाड़ाहाट के नाम से भी जाना जाता था। स्कन्दपुराण के केदारखण्ड में इस स्थान का वर्णन सौम्यकाशी के नाम से किया गया है। मान्यता है कि द्वापर युग के महाभारत काल में भगवान शिव ने किरात का रूप धारण करके यहीं पर अर्जुन से युद्ध किया था। केदारखण्ड के अनुसार उत्तरकाशी पांडव संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है, यहीं दुर्योधन ने पाण्डवों को मारने के लिये लाक्षागृह का निर्माण किया था।

एतिहासिक संदर्भ में उत्तरकाशी "पाल राजवंश" द्वारा शासित गढ़वाल राज्य का अंग था, संभवतया यही पाल वंश १५वीं शताब्दी में दिल्ली के सुल्तान बाहलुल लोदी द्वारा दी गई "शाह" उपाधि में परिवर्तित हो गया था। सन्‌ १८०३ में नेपाल के गोरखाओं द्वारा गढ़वाल राज्य पर आक्रमण किया तथा "अमर सिंह थापा" को इस क्षेत्र का राज्यपाल बनाया गया। वर्ष १८१४ में शासन देख रहे गोरखालोग ब्रिटिश सत्ता के संपर्क में आये। इन स्थितियों ने अंग्रेजों को गढ़वाल पर आक्रमण करने के लिये प्रेरित किया, फलस्वरूप अप्रैल १८१५ में अंग्रेजों ने गोरखाओं को खदेड़ कर गढ़वाल को अपने कब्जे में ले लिया और पूर्वी तथा पश्चिमी गढ़वाल में विभाजित कर दिया गया। पूर्वी गढ़वाल ब्रिटिश सत्ता के अधीन रहा जबकि पश्चिमी गढवाल को दून क्षेत्र सहित गढ़वाल राजवंश सुदर्शनशाह को दे दिया गया। यह राज्य टिहरी गढ़वाल के रूप में जाना जाने लगा और १९४७ में भारत स्वतंत्रता होने के उपरान्त १९४९ में यह उत्तर प्रदेश के राज्य के साथ विलय किया गया।

उत्तरकाशी जनपद का अधिकांश भाग पर्वतीय होने के कारण यहां का मौसम ग्रीष्म में सुहावना एवं सर्दियों में बहुत ठन्डा होता है। ऊंचाई वाले स्थानों पर अत्यधिक बर्फ पड़ती है तथा हिमपात के बाद कई इलाके अन्य इलाकों से कट जाते हैं। वर्षाकाल में उत्तरकाशी जिले में औसत वर्षा ८९७.३ मिमी होती है, गर्मियों में उत्तरकाशी जिले का औसत तापमान  २३.०७ डिग्री सेल्सियस तथा सर्दियों में औसत तापमान ७.५९ डिग्री सेल्सियस रहता है।

आवागमन के मुख्य साधनों में टिहरी गढ़वाल मोटर्स ओनर्स यूनियन लिमिटेड (टीजीएमओयू लि.), व उत्तराखण्ड परिवहन निगम की बसें हैं जो जनपद को टिहरी, पौड़ी, देहरादून, उत्तरप्रदेश, दिल्ली व उत्तराखण्ड के अन्य जनपदों से जोड़ती हैं। साथ ही जनपद के सभी मुख्य नगरों में टैक्सी यूनियन भी हैं जो कि वर्ष भर निरंतर पर्यटकों का आवागमन आसान करती हैं। जनपद का सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन लगभग १५५ किमी० की दूरी पर ऋषिकेश में स्थित है । जनपद का निकटतम एअरपोर्ट जौलीग्रांट देहरादून स्थित है जो कि उत्तरकाशी से लगभग १७५ किमी० की दूरी पर स्थित है ।

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