Wednesday June 20, 2018
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नन्दा राजजात - 2014 : सावधानियां, चेतावनी तथा सम्भावनाएं

नन्दा राजजात - 2014

Dr. Nand Kishore HatwalAugust 17, 2014 | पर्व तथा परम्परा

क्या आप आ रहे हैं इस बार राजजात में?
यदि आप 18 अगस्त 2014 से शुरू होने वाली राजजात में आना चाहते हैं तो इस यात्रा के बारे में पूरी जानकारियां प्राप्त कर लें। इस यात्रा का स्वरूप, मुश्किलें, चुनौतियां, खतरे, मौसम, पड़ाव, रास्ते, रहने खाने की व्यवस्था, क्या करें क्या न करें आदि की पूरी जानकारियां अभी से प्राप्त कर लें। इस यात्रा को हम एक्सपीडिसन, ट्रैकिंग, पर्वतारोहण या तीर्थयात्रा जैसा नहीं कह सकते हैं। यह इन सबका मिला जुला रूप है। एक अलग तरह की यात्रा। कुछ सम्भावित दिक्कतों के बारे में आपको इसलिए बताया जा रहा है कि यदि आप इस यात्रा में शामिल होने की योजना बना रहे हैं तो पूरी तैयारी के साथ आएं। उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद पहली बार राजजात का आयोजन होने जा रहा है। भारी संख्या में लोगों की भागीदारी से उत्पन्न दिक्कतें जैसे रहने, खाने, शौच आदि की समस्या सामने आ सकती है। सूचनातन्त्र विकसित होने से वैश्विक स्तर पर राजजात का प्रचार हो रहा है और देश विदेशों से लोगों की जिज्ञासाएं आ रही हैं। इसे उनके आने की सम्भावना के रूप में देखा जा रहा है। देश और दुनिया का मीडि़या भी इस तरफ नजरें गड़ाए है। होटल बुक हो रहे हैं। बड़ी संख्या में प्रवासी उत्तराखण्डियों की भी इस यात्रा में भाग लेने की सम्भावनाएं जताई जा रही हैं।
स्थानीय स्तर पर भी इस बार बहुत आधिक लोगों की भाग लेने की सम्भावनाएं हैं। इस बार इसमें जहां 88 साल बाद लाता, पैनखण्डा (जनपद चमोली का सीमावर्ती क्षेत्र) की नंदा की डोली शामिल होने जा रही है वहीं पहली बार मर्तोली, मुनस्यारी (पिथौरागढ़ जिले का सीमावर्ती क्षेत्र) से भी नंदा की यात्रा राजजात में सामिल होगी। कुमाऊं से रानीखेत, अल्मोड़ा, कोटभ्रामरी, बधियाकोट, पातालभुवनेश्वर आदि क्षेत्रों से नंदा की यात्रा आकर राजजात में सामिल होने का कार्यक्रम है। चमोली में भी इस बार सर्वाधिक क्षेत्रों से यात्राएं निकल कर राजजात में सामिल होने के कार्यक्रम तय हो चुके हैं। इस बार सर्वाधिक डोलियों, छंतोलियों और निसाणों का शामिल होना तय है। 2000 की राजजात में जहां 4 देवी की डोलियां और 234 के आसपास छंतोलियां शामिल हुई थी। पचास हजार लोग वैदनी तक पहुंचे और दस हजार लोगों ने सर्वाधिक उंचाई पर जाने वाला मार्ग ज्यूंरागली (17500 फीट) पार किया। इस बार 500 से उपर छंतोलियां आने की सम्भावनाएं बतायी जा रही हैं। बैदनी में लाखों लोगों के जमावड़े और लाखों लोगों के ज्यूंरागली को पार कर होमकुण्ड पहुंचने की सम्भावनाएं बताई जा रही हैं।

राजजात में खतरों का इतिहास गवाह
राजजात के खतरों का गवाह इतिहास भी है। रूपकुण्ड के नरकंकाल इस यात्रा में हुई दुघर्टनाओं की कहानी बयां करते हैं। नौवीं शताब्दी में कन्नौज के राजा जशधवल राजजात में आये थे। पातरनचैणियां के आसपास अचानक ओलावृष्टि होने लगी और उनका सारा का सारा लावलश्कर रूपकुण्ड में समा गया। राजा जशधवल के जागरों में स्थानीय लोग इस गाथा को वर्षों से गाते आ रहे हैं कि राजा जशधवल के लावलश्कर ने यात्रा नियमों का पालन नहीं किया और यात्रियों पर बर्फ के बड़े-बड़े पत्थर बरसने लगे-
रूपकुण्ड घर त्वेल मेघ बरसायो
बरफ का ल्वेड़ बरसायो
त्येरा न्येजा निसाण वै रूपकुन टूटा
लक्षेदल फौज वै रूपकुन बीतो

रूपकुण्ड के नरकंकालों के अध्ययन के बाद वैज्ञानिकों का मानना है कि 1200 साल पहले रूपकुण्ड में जो मौतें हुई वो सिर की हड्डियों के टूटने के कारण हुई। क्रिकेट के गेंद बराबर गोल किसी चीज से इनकी मौत हुई। मौसम विज्ञानियों का भी मानना है कि हिमालय में इतनी उंचाई पर अचानक मौसम का खराब हो जाना आम बात है। इस मौसम में (अगस्त सितम्बर में जब राजजात होती है) बर्फवारी और ओलावृष्टि इन इलाकों में सामान्य घटना है। मौसम विज्ञानियों ने स्थानीय जागरों में वर्णित लोकविश्वास बरफ का ल्वेड़ बरसायो की भी पुष्टि की है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस उंचाई पर अचानक तापमान में तब्दीली होने से ओलों का आकार सामान्य से बड़ा, क्रिकेट की गेंद के आकार का हो सकता है।

1951 में आयोजित राजजात के दस्तावेजों में दर्ज है कि उस वर्ष यह यात्रा होमकुण्ड नहीं पहुंच पाई थी और यात्रियों को खराब मौसम की मार झेलनी पड़ी थी। देवराम नौटियाल द्वारा राजजात समिति के रजिस्टर में दर्ज विवरण के अनुसार "22 गते भादो, 1951 ई0 में राजजात जब पातर नचैणियां पहुंची तो मौसम का प्रकोप शुरू हो गया था। शाम से लगातार मोटी वर्षा होने से कैलुवा विनायक तक डेढ़ फिट बर्फ जम गई। तापमान बहुत गिर गया था। 23 गते भादो भी पातर नचैणिया रहना पड़ा लेकिन मौसम नहीं सुधरा। अंततः सबको हताश होकर वापस आना पड़ा।"

यात्रा की सर्वाधिक चुनौती भरी तिथियां और क्षेत्र
30 अगस्त से 4 सितम्बर तक यह यात्रा सर्वाधिक संवेदनशील इलाकों से गुजरेगी। इस पर भी 1, 2 और 3 सितम्बर को यात्रा क्रमशः पातरनचैणियां (3885 मी0), शिला समुद्र (4002 मी0) और होमकुण्ड (अंतिम स्थान जहां पर पूजा कर वापस लौटते हैं।) से लौट कर चनोण्यां घट (3635 मी0) पहुंचेगी। यही सबसे खतरे वाला क्षेत्र है। इस दुर्गम हिमालयी क्षेत्र और यात्रा पथ की क्षमता से आधिक लोगों के आने और मौसमी खतरे की सम्भावनाओं से निपटने की चुनौती के लिए तैयारी के साथ आना जरूरी है।

यद्यपि यह समय उत्तराखण्ड में मानसूनी वर्षा के अंतिम दौर का होता है। लेकिन मौसम विभाग का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों से मौसम ने जिस प्रकार करवट बदली है उसे देखते हुए सितम्बर की इन तिथियों को भारी वर्षा की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। भूस्खलन, रास्ते की टूट-फूट, कीचड़, ढलान युक्त रास्तों पर फिसलन, खाद्य और अन्य जरूरी सामग्री की सप्लाई बाधित होना इस मौसम में आम बात है। इससे निपटने के लिए भी तैयार रहना होगा।
यात्रा मार्गों पर भीड़ की सम्भावना वाले स्थल भी मुश्किले खड़ी करते हैं। 2000 की राजजात में चांदपुर गढ़ी में दिन के 1 बजे के आसपास, जब जात वहां पहुंची तो लगभग 50000 लोग एकत्र हुए। तीन-चार कि0मी0 तक गाडि़यों की लम्बी कतार खड़ी थी। दिन की धूप और पानी की कहीं कोई व्यवस्था नहीं। बड़ी संख्या में स्थानीय लोग गढ़ी में देवी के दर्शन के लिए आये थे लेकिन असफल रहे। इसी प्रकार नारायणबगड़ के निकट क्यौर गधेरे के दोनो ओर उस संकरे स्थान पर 20 हजार लोग एकत्र हुए। लोकविश्वास है कि यहां से देवी का मायका क्षेत्र समाप्त होकर ससुराल क्षेत्र लगता है और देवी गधेरे के पार, ससुराल क्षेत्र में नहीं जाना चाहती है, बार-बार बीच पुल से वापस लौट आती है। स्थानीय लोगों के लिए यह एक मार्मिक दृश्य होता है। यही देखने के लिए वहां पर भीड़ एकत्र होती है। क्यौर गधेरे में लगे कच्चे पुल में क्षमता से अधिक लोगों के खड़े होने से कुछ भी अनहोनी घट सकती थी। इसी प्रकार फरगलीधार, कुलसारी, नंदकेशरी, वाण, वैदनी आदि भीड़ वाले स्थल हैं जहां अतिरिक्त व्यवस्थाओं की आवश्यकता होगी। इसी प्रकार उपयात्रा मार्गों पर रामणी एक ऐसा पड़ाव है जहां पर कुरूड़-दशोली, लाता, दशमद्वारा, बंड, खैनुरी-क्षेत्रपाल, फस्र्वाणफाट, बदरीश आदि उपयात्राओं का मिलन होता है और अगले दिन ये सभी साथ साथ आला और कनोल में पड़ाव के बाद तीसरे दिन वाण पहुंच कर मुख्य यात्रा में शामिल होते हैं।

सुखद सम्भावनाएं भी हैं
यह यात्रा इन तमाम मुश्किलों और चुनौतियों के साथ कुछ सुखद अनुभूति भी आपको देगी। आली, वैदनी, क्वांरी के खूबसूरत बुग्याल, स्कल्टैन लेक रूपकुण्ड की मिस्ट्री, सुपताल, झलताल, तड़ाकताल, वैदनी कुण्ड, अलकनंदा, पिण्डर और नंदाकिनी सहित इस जिले की आकूत जल सम्पदा, संगम, मंदिर, नृत्य, गीत, जागर, झोड़े, वस्त्र, आभूषण, खान-पान, ककड़ी, भुट्टे, आड़ू, च्यूड़ा, खाजा इन सबसे आप रूबरू होंगे। यह एकमात्र सांस्कृतिक यात्रा है जो ऐसे अवसर अपने साथ लेकर आयेगा। यह पर्यटन, पथारोहण, पर्वतारोहण, साहसिक अभियान, तीर्थयात्रा और विशिष्ट सांस्कृतिक आयोजनो के देखने की समवेत अनुभूति आपको कराएगा। यह धार्मिक यात्रा एक नए तरह के पर्यटन और तीर्थाटन का आनन्द भी आपको देगा। राजजात के बहाने आप उत्तराखण्ड हिमालय में प्रतिवर्ष होने वाली नंदाष्टमी की वार्षिक जातों और अन्य धार्मिक यात्राओं का भी जानकारी ले पाएंगे। आपको जानेंगे कि इस तरह की यात्रा सिर्फ बारह सालों में नहीं प्रतिवर्ष भी होती है।

अन्य स्थानों से भी चलती हैं यात्राएं
राजजात एक बहती हुई नदी की तरह है। जैसे विभिन्न स्थनो से जलधारा निकल कर मुख्य नदी में मिलती जाती है और नदी बड़ी होती जाती है और समन्दर की ओर बढ़ती जाती है उसी प्रकार राजजात की शुरूवात तो नौटी से होती है लेकिन उत्तराखण्ड के विभिन्न स्थानों से इसी प्रकार यात्रा निकल कर स्थान स्थान पर इस यात्रा में मिलती जाती है, कारवां बढ़ता जाता है। ये यात्राएं कम रोमांचक नहीं होगी। लाता, पैनखण्डा की डोली बड़गांव, सलूड़ होते हुए सेमकूड़ा, ढक्वाणी और कालीघट के निर्जन पड़ावों में रात्रि विश्राम करते हुए विरही घाटी में झींझी और रामणी होकर 10 पड़ावों के बाद मुख्य यात्रा में वाण में मिलेगी। सेमकूड़ा, ढक्वाणी और कालीघट के निर्जन पड़ावों में आपके सामने रात बिताने का रोमांच और चुनौती होगी। इसी प्रकार कड़ाकोट क्षेत्र की यात्रा सुपताल और खामिला सिमार जैसे मुश्किल इलाकों में रात्रिपड़ाव डालते हुए 5 दिन बाद मुख्य यात्रा में सामिल होगी। फस्र्वांणफाट की यात्रा क्वेराली जंगल और दनाला जंगल जैसे वीरान इलाकों में रात बिताने के बाद 5 दिन की यात्रा के बाद वाण पहुंचेगी। खैनुरी-क्षेत्रपाल की यात्रा भिनोट और गानाखर्क जैसे कठिन पड़ाव में रात बिताने के बाद मुख्य यात्रा में शामिल होगी। कुरूड़-बधाण की नंदाडोली के साथ निकलने वाली यात्रा 8 दिनो तक विभिन्न गांवों में रात्रि विश्राम के बाद 9 वें दिन नंदकेशरी में नौटी से आने वाली मुख्य यात्रा में शामिल होगी। कुरूड़-दशोली की यात्रा 11 दिन तक विभिन्न गांवों में विश्राम करते हुए 12 वें दिन मुख्य यात्रा में वाण में मिलेगी। इसी प्रकार दशमद्वार, विरहीघाटी, बद्रीश छंतोली, बंड, जस्यारा आदि उप यात्रामार्गों का यात्रा पथ भी कम चुनौती पूर्ण नहीं है। अल्मोड़ा, पाताल भुवनेश्वरी, बधियाकोट, कोटभ्रामरी, रानीखेत, मार्तोली की यात्राओं का विभिन्न पड़ाओं से होते हुए 26 अगस्त 2014 को नंदकेशरी में गढ़वाल क्षेत्र की यात्रा से मिलन होगा। इन उपयात्रा मार्गों पर यात्रा के अलग रंग होंगे।  समस्याएं होंगी और चुनौतियां भी। कितने लोग इसमें शामिल होंगे? इन मार्गों की क्या दिक्कतें आएंगी? किन मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है? अभी यह सब तय नहीं है। यह कठिन यात्रा और मुश्किल धार्मिक अनुष्ठान में स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए भी एक चुनौती होता है। उन्हें भी मदद की दरकार रहती है। आप यदि इन उपयात्रा मार्गों से यात्रा के इच्छुक हों तो पूर्ण तैयारी के साथ आएं। उपयात्रा मार्ग की पूरी जानकारी ले लें। दुकाने, बस्ती, पड़ाव, रास्ते, दूरियों बारे में जानकारी प्राप्त कर लें। अपने रहने खाने की व्यवस्था के साथ आएं तो ज्यादा सुविधा रहेगी। 



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