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नंदादेवी राजजात-2014 : इतिहास, परंपरा, महत्व

नंदादेवी राजजात-2014

Dr. Nand Kishore HatwalAugust 09, 2014 | पर्व तथा परम्परा

नंदादेवी राजजात
बारह अथवा उससे अधिक वर्षों में उत्तराखण्ड हिमालय में उच्च हिमालय की 280 कि0मी0 की परम्परागत यात्रा को राजजात कहा जाता है। यह एक धर्मिक यात्रा है जो कि यहां के निवासियों द्वारा सामूहिक रूप से, साथ-साथ की जाती है। नौटी और कुरूड़ से निकलने वाली यात्रा को मुख्य यात्रा माना जाता है लेकिन इसके अलावा भी उत्तराखण्ड के कई स्थानो से इस अवसर पर यात्रा निकलती है और मुख्य यात्रा में सामिल होती जाती है। नौटी से राजजात आरम्भ होने के बाद पूरे उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों, स्थानों और गाँवों से वहाँ के देवी के निसाणों और छंतोलियों के साथ यात्रा निकलती है और अलग-अलग स्थानों पर नौटी से आने वाली यात्रा में शामिल होने लगती है। इसमें प्रमुख रूप से कुरूड़, दशमद्वार, लाता, अल्मोड़ा, कोट, डंगोली से आने वाली यात्रा शामिल है। इनके अलावा उत्तराखण्ड के सैकड़ों गाँवों, क्षेत्रों की छंतोलियाँ राजजात में शामिल होती हैं। सन् 2000 में आयोजित राजजात में 118 गाँवों से लगभग 255 छंतोलियां इस यात्रा में शामिल हुई थी। 2014 में आयोजित होने वाली राजजात में उत्तराखण्ड के कुछ अन्य क्षेत्रों से भी यात्रा आने की सम्भावनाएं हैं। राजजात को हिमालय का महाकुम्भ भी कहा जाता है। उत्तराखण्ड में राजजात सांस्कृतिक अनुष्ठान बन गया है। 

प्राचीन समय में गढ़वाल के राजवंशों द्वारा इस यात्रा का आयोजन किया जाता था। इतिहासकार मानते हैं कि इसकी शुरुआत नौवीं सदी में हुई थी। उस समय गढ़वाल में पंवारवंशी शासकों का साम्राज्य था तथा जिनकी राजधनी चाँदपुर गढ़ी में थी। शालिजपाल ने 9वीं सदी में छोटी-छोटी जातों; प्रतिवर्ष होने वाली नंदादेवी की परम्परागत यात्राओं को मिलाकर सांस्कृतिक और राजनैतिक एकता स्थापित करने के लिए बड़ी यात्रा का आयोजन किया था। इसलिए इस यात्रा को राजजात कहा जाने लगा। इसमें नन्दा देवी यात्रा में जाती है तो वह एक दैवीय दुल्हन के रूप में जाती है। यह यात्रा मुख्य रूप से नंदा देवी को उसके मैत (मायके) से ससुराल विदा करने की यात्रा है। राजजात में नंदा को मायके के ससुराल भेजने की भावना रहती है। राजजात उत्तराखण्ड हिमालय की एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक यात्रा है। यह यात्रा सांस्कृतिक पर्यटन तथा आस्था का अद्भुत संगम है।
 
राजजात की शुरुआत नौटी से होती है। परम्परानुसार भाद्रपद के पहले नवरात्रा में कांसुवा के कुंवर चैसिंग्या खाड़ू (मेढ़ा) तथा रिंगाल की छंतोली लेकर नौटी पहुंचते हैं। अगले दिन नंदादेवी को खाड़ू के साथ ईड़ा बधणी लाया जाता है। रात्रि विश्राम के पश्चात् यात्रा पुनः नौटी वापस आती है। नंदा की ससुराल के लिए विदाई तीसरे दिन होती है। इस दिन नंदादेवी राजजात चैसिंग्या खाड़ू तथा छंतोली सहित राजवंशीय कुंवरों के गाँव कांसुवा पहुंचती है।

चैसिंग्या खाड़ू राजजात का प्रमुख आकर्षण होता है। चैसिंग्या खाड़ू 4 सींग वाला मेढ़ा के बारे में मान्यता है कि जब नंदादेवी दोष लगती है तभी यह जन्म लेता है। राजजात के दौरान यह भी साथ-साथ चलता है। इसे देवी का संदेशवाहक माना जाता है। स्थानीय लोग इसी चार सींग वाले मेढे़ के फांचे (मेढ़े पर बंधी पोटली) में अपनी भेंट तथा सौगात डाल कर नंदादेवी के लिए पहुंचाते हैं।

वस्तुतः यह यात्रा नंदा देवी के मायके से ससुराल जाते हुए स्त्रियों की यात्राओं का अनुष्ठानिक रूप भी है। ढोल-दमाऊं और भंकोरो के साथ राजजात का काफिला आगे बढ़ता है। प्रत्येक गाँव में यात्रा का परम्परागत जागर गायन और ढोल दमाऊं के साथ स्वागत किया जाता है। स्थानीय उत्पाद- च्यूड़ा, भुजला, ककड़ी, मकई, संतरे, आदि तमाम प्रकार की सौगात देवी के लिए दी जाती है। यह यात्रा चाँदपुर गढ़ी जैसे ऐतिहासिक स्थानो से होते हुए विभिन्न गाँवों कस्बों से गुजरते हुए आगे बढ़ती है। जिस गाँव में भी यात्रा पहुंचती है वहाँ पर बड़ी मात्रा में जनसमूह एकत्र होता है। यात्रियों का भरपूर स्वागत होता है। सब लोग सामूहिक भोजन करते हैं। रात को नंदादेवी के जागर और विदाई गीत गाए जाते हैं। लगभग 280 कि0मी0 लम्बी इस यात्रा के 20 पड़ाव हैं।

राजजात का शुभारम्भ
नंदादेवी राजजात का शुभारम्भ नौटी से होता है। यात्रा की पूर्वसंध्या पर कांसुवा के कुंवर अपने पैत्रिक गांव से चार सींग के मेढे़ तथा राजछंतोली लेकर नौटी पहुंचते हैं। नौटी गांव की सीमा पर इनका भव्य स्वागत किया जाता है। नौटी में नंदादेवी की स्वर्ण प्रतिमा पर प्राणप्रतिष्ठा की जाती है तथा चारसींग वाले मेढ़े एवं छंतोली की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। नंदा को ससुराल भेजने के लिए आभूषण, वस्त्र तथा अन्य उपहार चारसींग वाले मेढ़े के पीठ पर फांचे (पोटली) में बांध दिये जाते हैं। यहां पर नंदादेवी का श्रीयंन्त्र भूमिगत है। इसके ऊपर मन्दिर का निर्माण नहीं हो सकता है। यहां पर वीर, गोरजा, उफराई, लाटू, हित, मैलेश्वर, रामेश्वर के प्राचीन मन्दिर हैं। ऊफराई देवी नौटी गाँव की भूमियाल है राजजात से पूर्व भूमियाल देवता की बड़ी पूजा होती है। इस पूजा को मौडिवी कहा जाता है।
 
नौटी राजगुरुओं (नौटियाल) का मूलगाँव है। बताया जाता है कि नौटी का प्राचीन नाम गोदी था। जो अपभ्रशं होकर नौटी हो गया और यहाँ रहने वाले आद्य गौड़ ब्राह्मण नौटियाल कहलाये जाने लगे। राजगुरू नौटियाल के परिवार राजा की राजधनी बदलने के साथ-साथ चलते रहे हैं। फलस्वरूप श्रीनगर, टिहरी के समीपवर्ती क्षेत्रों में अनेक गाँव नौटियालों के बस गये हैं। जो आज भी नौटी पूजा में उत्साह पूर्वक शामिल हाते हैं।

नौटी में लोकनिर्माण विभाग का निरीक्षण भवन, प्राइमरी स्कूल, पंचायत घर, गढ़वाल मंडल विकास निगम का 30 शैय्याओं का आवासगृह, स्टेट बैंक, एैलोपैथिक अस्पताल, डाकघर, टेलीफोन एक्सचैन्ज, विद्युत व पेयजल की सुविधा उपलब्ध है। नौटी से 3 कि.मी. की दूरी पर नन्दासैंण में वन विभाग का डाक बंगला है। नौटी से कांसुवा होकर पौड़ी व कोटद्वार के लिये भी सीधे मोटर मार्ग उपलब्ध हैं।



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Comments

1

रामरतन असवाल | August 31, 2014
अतिसुन्दर, बहुत ही अच्छी जानकारी है श्री नन्दादेवी राजजात के बारे में। श्री नन्दकिशोर हटवाल जी और आप उत्तराखण्ड टेम्पल्स की टीम का बहुत बहुत धन्यवाद। आशा करते हैं कि आगामी भविष्य में भी आपसे उत्तराखण्ड से जुड़ी परंपराओं और सांस्कृतिक पर्वों की जानकारी मिलती रहेगी। हमें खुशी है कि आप जैसे लोग प्रयासरत हैं।

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