Tuesday December 11, 2018
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बाल्मीकेश्वर महादेव, ग्राम कोरसाड़ा पौड़ी

बाल्मीकेश्वर महादेव, ग्राम कोरसाड़ा पौड़ी
बाल्मीकेश्वर महादेव, ग्राम कोरसाड़ा पौड़ीबाल्मीकेश्वर महादेव, ग्राम कोरसाड़ा पौड़ीबाल्मीकेश्वर महादेव, ग्राम कोरसाड़ा पौड़ी

किसी नाम के आगे ईश्वर लगाकर उसको किसी देवी-देवता की उपाधि से विभूषित कर देना हिन्दू संस्कृति की पुरानी परंपरा है। रामायण काल के मूक साक्षी सितोन्स्यूं क्षेत्र में जहां मनसार का मेला लगता है, से एक फर्लांग की दूरी पर तीन नदियों के संगम पर स्थित हैं। कोटमहादेव जिसे आज भी बाल्मीकेश्वर के नाम से जाना जाता है। यहीं कोरसाड़ा ग्राम के मध्य कुषाण कालीन ईंटे प्राप्त हुई हैं। जिनसे इस क्षेत्र की तत्कालीन आवसीय व्यवस्था के साक्ष्यों की पुष्टि होती है। कोट महादेव के निकट ही कोरसाड़ा ग्राम के ऊपर एक ऊंचे टीले पर पाषाण का प्राचीन मन्दिर आज भी सुरक्षित खड़ा है। इस मन्दिर में आज कोई मूर्ति नहीं है और ना उसका धार्मिक महत्व ही किसी को विदित है परन्तु स्थानीय निवासियों के अनुसार इसे बाल्मीकि कुटिया कहा जाता है। हो सकता है कि ऐतिहासिक सामग्री के सर्वथा आभाव में इन सब तथ्यों को प्रमाणिक करना भी मुश्किल है परन्तु यह निर्विवाद है कि रामायण काल में पट्टी सितोन्स्यूं ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण उपत्त्यका रही है। सीता माता के नाम पर यहां का नामकरण और उसी से संबन्धित मनसार मेले की स्थापना इसकी ऐतिहासिकता की सूचक है।

यह ऐतिहासिक घटनाओं से इतनी घनिष्टतापूर्वक संबन्धित है कि उसे सर्वथा अकारण कहने का साहस नहीं होता। आज भी यहां के खेतों में सैकड़ों वर्ष पुरानी असाधारण माप की ईंटें प्राप्त होती हैं। वह ईंटें कब और क्यों बनाई गईं यह सब अविदित है कि खुदाई करने पर कई स्थानों से प्राचीन ऐतिहासिक वस्तुयें निकलती हैं। लगभग पांच दशक पूर्व कोटासाड़ा और उड्डा गांव में खेल ही खेल में लड़कों द्वारा तीन बड़े प्राचीन कुण्ड निकले हैं। नागर्जुन गांव के खण्डहरों में कई शिवलिंग मिलें हैं। कई गावों में विशाल प्रस्तरखण्डों द्वारा निर्मित वृह्दाकार थर्प उस युग के पंचायत राज की सर्वोत्तम    प्रजातन्त्रात्मक शासन प्रणाली के परिचालक हैं।



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