Tuesday December 11, 2018
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आदेश्वर महादेव रानीगढ़, अदवानी पौड़ी

आदेश्वर महादेव रानीगढ़, अदवानी पौड़ी
आदेश्वर महादेव रानीगढ़, अदवानी पौड़ीआदेश्वर महादेव रानीगढ़, अदवानी पौड़ीआदेश्वर महादेव रानीगढ़, अदवानी पौड़ी
आदेश्वर महादेव मन्दिर "रानीगढ़", अदवानी, पौड़ी गढ़वाल

आदेश्वर महादेव मन्दिर "रानीगढ़" पहुंचने के लिये पौड़ी मुख्यालय से कण्डोलिया होते हुये पौड़ी-कांसखेत-सतपुली मोटर मार्ग पर लगभग १८ कि०मी० का सफर तय करके अदवानी नामक एक छोटे से गांव तक आना पड़ता है। यह पूरा क्षेत्र गढ़वाल वन प्रभाग के आरक्षित वन क्षेत्र में आता है। आदवानी में मन्दिर का प्रवेश द्वार स्थित है यहां से मन्दिर तक पहुंचने के लिये अदवानी से का लगभग १ कि०मी० का सफर बांज, बुरांश, काफल, देवदार तथा चीड़ के घने जंगल में सीढ़ीनुमा पगडण्डी रास्ते से गुजरते हुये पैदल ही तय करना पड़ता है। समुद्रतल से १८०० मीटर की उंचाई पर पर्वत की चोटी पर स्थित यह स्थान अपनी नैसर्गिक सुन्दरता के प्रसिद्ध है। इस स्थान से उत्तराखण्ड की सुरम्य छटा देखने को मिलती है। रानीगढ़ से चन्द्रबदनी, सुरकण्डा, कुंजापुरी, नीलकंठ, डांडा नागराजा, खैरालिंग (मुण्डनेश्वर महादेव), बिंदेश्वर, एकेश्वर महादेव, ताड़केश्वर, भैरवगढ़ी आदि स्थानों के नयनाभिराम दर्शन होते हैं।
रानीगढ़ स्थित आदेश्वर महादेव मन्दिर का वास्तु सामान्य तथा स्थानीय गढ़वाली मन्दिरों की भांति हैं। मंदिर के अन्दर एक शिवलिंग स्थापित है तथा शिव, गणेश सहित शिवपरिवार की प्रतिमायें रखी हैं। इस मन्दिर का जीर्णोद्धार वर्ष २००२ में स्थानीय लोकनायक श्री शिवसिंह पटवाल ग्राम खपरोली ने करवाया था। मुख्य मन्दिर से थोड़ा पीछे हटकर एक छोटा सा मैदान है जिसे कि हाथी-मैदान के नाम से जाना जाता है। इस मैदान के किनारे-किनारे तीन-चार छोटे-छोटे प्राचीन मन्दिरों के अवशेष स्थित हैं जो कि गढ़वाल के मकानों की तरह पत्थर की लगभग डेढ़-दो फीट मोटी दीवारों के बने हैं, इन मन्दिरो कें कुछ प्राचीन मूर्तियां रखी हुई हैं जो संभवतया इस स्थान की प्राचीनता का साक्ष्य हैं।
ऐतिहासिक दृष्टि से रानीगढ़ की गढ़वाल के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार सन्‌ १८०४ में गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर में बगावत के हालात हो गये थे। उस समय राजा "उपेन्द्रशाह" की पटरानी "राजमाता छजोली" अपने चार वर्षीय पुत्र "प्रद्द्युमन शाह" को लेकर सेनापति पुरिया नैथानी के नेतृत्व में इस पर्वत शिखर पर आकर एक लंबे समय तक अज्ञातवास में रहीं थी। इसी कारण इस स्थान को रानीगढ़ के नाम से जाना गया। सेनापति पुरिया नैथानी समीप स्थित ग्राम नैथाना के निवासी थे और संभवतया उन्होने इस पर्वत शिखर की निर्जनता के कारण इस स्थान को अबोध राजकुमार तथा रानी के आज्ञातवास हेतु उपयुक्त समझा होगा। आज भी रानीगढ़ के ठीक नीचे स्थित "छजोलीधार" नामक स्थान, रानी "छजोली" के नाम से ही जाना जाता है। कहा जाता है कि राजकुमार के साथ खेलने हेतु उस समय एक हाथी भी यहां लाया गया था। संभवतया मन्दिर परिसर के पीछे का हाथी मैदान तथा उसमें उगने वाली हाथी घास इसी बात का साक्ष्य है अन्यथा उत्तराखण्ड में अन्यत्र कहीं भी किसी पर्वतीय शिखर पर इस तरह की हाथी घास नहीं होती है। रानीगढ़ की देखरेख तथा सुरक्षा के दायित्व हेतु "रानीगढ़ पर्यटन विकास समिति" की स्थापना की गई है। रानीगढ़ से सन्‌ २००२ से प्रतिवर्ष मेले का भी आयोजन किया जा रहा है जिसमें बड़ी संख्या में स्थानीय लोग सम्मिलित होते हैं।



फोटो गैलरी : आदेश्वर महादेव रानीगढ़, अदवानी पौड़ी

Comments

1

jagmohan singh rawat | November 22, 2017
puria naithani ji ka period 17 th century ka hey , 1804 me vo nahi they , ranigarh ki isthapna bahut purani hey

2

Bhag Chand Solanki | November 26, 2013
अति सुन्दर भव्य स्थान

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