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नन्दा देवी राजजात के पड़ाव - दूसरा पड़ाव - ईड़ाबधाणी से नौटी

Vinay Kumar DograAugust 21, 2014 | पर्व तथा परम्परा

नन्दा देवी राजजात के पड़ाव - दूसरा पड़ाव - ईड़ाबधाणी से नौटी
आज १९-अगस्त-२०१४ नन्दा देवी राजजात यात्रा के दूसरे दिन ईड़ाबधाणी से वापस नौटी के लिये रवाना होती है। ईड़ाबधाणी के मन्दिर में जागरों में वर्णित विधि-विधान के अनुसार गाढ़े सफेद कपड़े का थान बिछावाकर भगवती नन्दादेवी और राजजात यात्रियों का स्वागत किया गया था। रातभर जागरण तथा परम्परागत विधि-विधान से नंदादेवी की पूजा अर्चना के बाद आज माता नन्दा की वापसी पुन: नौटी के लिये होगी। वापसी मार्ग में रिठोली, जाख, दियारकोट, कुकडै़, पुडियाणी, कनोठ, झुड़कण्डै व नैंणी गाँवों में पूजा लेकर रात्रि विश्राम हेतु नौटी पहुँचती है। इस रात्रि मन्दिर में रातभर जागरण होता है। इसी दिन भगवती नन्दादेवी की ससुराल के लिये हलवा, पिंजरी, गुड़पापड़ी आदि पकवान बनाये जाते हैं। लोक इतिहास के अनुसार नन्दा गढ़वाल के राजाओं के साथ-साथ कुँमाऊ के कत्युरी राजवंश की ईष्टदेवी थी। ईष्टदेवी होने के कारण नन्दादेवी को राजराजेश्वरी कहकर सम्बोधित किया जाता है। नन्दादेवी को पार्वती की बहन के रुप में देखा जाता है परन्तु कहीं-कहीं नन्दादेवी को ही पार्वती का रुप माना गया है। नन्दा के अनेक नामों में प्रमुख हैं शिवा, सुनन्दा, शुभानन्दा, नन्दिनी। पूरे उत्तराखंड में समान रुप से पूजे जाने के कारण नन्दादेवी के समस्त प्रदेश में धार्मिक एकता के सूत्र के रुप में देखा गया है। नन्दादेवी राजजात उत्तराखंड की ऐतिहासिक और पारंपरिक धार्मिक यात्रा है।यह विश्व की सबसे लम्बी पैदल 280 किलोमीटर लम्बी यात्रा है। हर बार साल में होने वाली माँ नंदा देवी की इस यात्रा को हिमालय का कुम्भ भी कहते हैं। जात का अर्थ होता है देवयात्रा अतः नन्दा राजजात का अर्थ है राज राजेश्वरी नन्दादेवी की यात्रा। यह यात्रा इष्ट देव भूमि में मानव और देवताओं के संबंधों की अनूटी दास्तान है। यह यात्रा पहाड़ के कठोर जीवन का आयना है। तो पहाड़ी में ध्याणी (विवाहित बेटी-बहन) के संघर्षों की कहानी भी है।  

लेख साभार : श्री नन्दकिशोर हटवाल



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